Saturday, September 19

ये ऐसे बिहारी है जिनका रोजगार लॉकडाउन ने छीना तो खड़ी कर दी कंपनी बाजार में खूब हो रही मांग

कोरोनाकाल में लॉकडाउन (Lockdown) के कारण जब काम बंद हो गया और घर आना मजबूरी हो गई तो आगे रोजगार मिलेगा या नहीं इन सभी बातो की चिंता ने जमुई जिले के दो युवकों को नई राह दे दी. 15 साल से तमिलनाडु के सेलम स्थित एक फुटवियर कंपनी (Footwear Company) में काम करने वाले दोनो युवकों ने मिलकर अपने घर में ही जूते-चप्पल बनाने की फैक्ट्री लगा डाली। अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का लोकल के लिए वोकल का (Vocal For Local) नारा को बल देते हुए ये दोनो युवक अब गांव में खुद का रोजगार कर आमदनी कमा ही रहें हैं और लोगो को रोजगार भी दे रहें हैं।

अशोक दास और संतोष दास की फैक्ट्री में मेडिकेटेड जूते-चप्पल बनते है जिसकी मांग स्थानीय बाजार मे खूब हो रही है। जमुई जिला के लक्ष्मीपुर इलाके के मोहनपुर गांव के युवक अशोक दास और उसका बहनोई संतोष दास बीते 15 साल से तमिलनाडु के सेलम स्थित एक फुटवियर कंपनी में काम करते रहें हैं. सेलम के फुटवियर कंपनी में बतौर तकनीशियन काम करते हुए ये लोग विदेश से आए लोगों से भी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, खासकर दिव्यांगजनो और डायबिटिज के मरीजो के लिए जूते-चप्पले बनाने का. फुटवियर कंपनी में कई साल काम करने के दौरान जब कोरोना के कारण इन दोनो की परेशानी बढ़ गई तो घर लौटे. इसी दौरान अशोक की मां ने जिद कर दिया कि वो अब दूसरे प्रदेश न जाकर यही कुछ करें. तब अपने हुनर की पहचान कर अशोक और संतोष नें अपने गांव और घर में ही रोजगार करने की ठान ली.लॉकडाउन के बाद जब अनलॉक हुआ तो कोलकाता से जूते-चप्पल बनाने की मशीन मंगवा कर खुद की फुटवियर कंपनी खोल दी. लोकल के लिए वोकल होने की जरुरत को मानते हुए इन दोनों युवाओं ने अपनी फैक्ट्री में ही दिव्यांगजनो और डायबिटीज के मरीजो के लिए जूते चप्पल बनाना शुरु कर दिया।

चुकि इनके प्रोडक्ट लोकल हैं और सस्ते मूल्य पर लोगो को लिए उपलब्ध है इस कारण मांग भी बढ़ गई. बीमार लोगों को लिए जरूरत के हिसाब से फुटवियर बनाने की प्राथमिकता देते हुए ये लोग जेनरल लोगों के लिए भी जूते-चप्पल बनाते हैं। इनकी फैक्ट्री में मेडिकेटेड फुटवियर का निर्माण होने की जानकारी होने के बाद इनके प्रोडक्ट की मांग बढ़ गई है. मात्र ढाई महीने में ये लोग आर्थोपैडिक्स डाक्टरों के पास से आए दर्जनो आर्डर को पूरा कर चुके हैं. सस्ता और लोकल प्रोडक्ट होने के साथ-साथ मामूली शिकायत को तुरंत दूर कर देने के कारण इनकी फुटवियर की मांग भी बढते जा रही है. जमुई से निकलकर दूसरे जिलों से आने वाले आर्डर को देखते हुए इन लोगों ने अब सरकार को भी टैक्स देना शुरू कर दिया है।

अशोक दास का कहना है कि जबसे उन लोगों ने यह काम शुरू किया है मेडिकेटेड जूते और चप्पल की खूब मांग हो रही है. जिले के कई ऑर्थोपेडिक डॉक्टर उनसे संपर्क कर मरीजों के सहूलियत अनुसार जूते और चप्पल ऑर्डर देकर बनवाते हैं, जिससे उनकी आमदनी हो रही है. जिस जूते-चप्पल को 600 रुपया में बेचते हैं उसकी कीमत दूसरे जगह से मंगाने पर दो से ढाई हजार की पड़ती है, अब आगे योजन है कि दोनों मिलकर डेढ़ से दो सौ लोगों को रोजगार दें.

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